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बैट-बॉल के खेल को जुनून में बदलने वाली मैगजीन थी क्रिकेट सम्राट, वो भी ‘अपनी भाषा’ में…



सुमित सुन्द्रियाल, खेल पत्रकार

बचपन के दिन ऐसे होते हैं, जिसमें किसी भी बात का, घटना का या किसी खास चीज का बड़ा असर होता है. ये असर किसी भी बच्चे के संवरने और आने वाले भविष्य में उसके जुनून या फिर करियर की राह तय करने में अहम भूमिका निभाता है.

कुछ ऐसा ही असर मुझ पर हुआ था ‘क्रिकेट सम्राट’ का. हिंदी भाषी क्षेत्र का कोई भी शख्स, जिसे क्रिकेट में अच्छी खासी दिलचस्पी रही हो, वो इस नाम से बखूबी वाकिफ होगा. ये नाम है हिंदी में क्रिकेट की सबसे बड़ी, सबसे मशहूर और सबसे बेहतरीन मैगजीन का. अब ये सिर्फ नाम भर रह गया है, क्योंकि इस मैगजीन का अब अंत हो गया है.

अभी कुछ ही दिन पहले ट्विटर पर नजर पड़ी कि क्रिकेट सम्राट अब फिर कभी नहीं आएगी. उस ट्वीट को देखकर मैं आगे बढ़ गया. उस वक्त उसका कुछ असर नहीं हुआ. लेकिन कुछ देर बाद जब दोबारा इस पर एक खबर पढ़ी थी, तो अचानक एहसास हुआ कि ये ‘क्रिकेट सम्राट’ के अंत की बात हो रही है. वो मैगजीन, जिसने क्रिकेट को लेकर सिर्फ गेंद और बल्ले के खेल की समझ से आगे इसकी बारीकियों, आंकड़ों और इतिहास की जानकारी और अहमियत बताई.

अपनी भाषा में क्रिकेट को समझने का मिला मौका

क्रिकेट सम्राट के साथ मेरा जुड़ाव सिर्फ 1-2 साल का रहा, लेकिन ये वो साल थे जब क्रिकेट जुनून बन चुका था. इसको लेकर घर में कई बार डांट और मार तक पड़ जाती थी. ये बात करीब 2002-2003 के आस-पास की है. उस वक्त मैं सातवीं में था. पड़ोस में एक बड़े भैया ने मेरा इस मैगजीन से परिचय करवाया था.

पहली बार ‘क्रिकेट सम्राट’ नाम ने ही दिल को खुश और दिमाग को आकर्षित कर दिया था. फिर पन्ने दर पन्ने पलटते हुए कई रंगीन और बेहतरीन तस्वीरें देखते-देखते नजरें उन पर गढ़ गई और ये मैगजीन तो बस जहन में छप गई. क्रिकेट खेलने के साथ-साथ क्रिकेट को गहराई से पढ़ने और समझने की लालसा बढ़ने लगी थी.

अंग्रेजी की नासमझी के बीच क्रिकेट की बारीकियों को समझने के लिए मेरी अपनी भाषा हिंदी में मुझे ज्ञान का भंडार मिल गया था. क्रिकेट के लिए दीवानगी बढ़ाने में इस मैगजीन का और भी बड़ा हाथ था.


एक जगह रिपोर्ट, आंकड़े और इतिहास

इस मैगजीन की सबसे बड़ी खासियत इसकी बेहतरीन मैच रिपोर्ट और उसके साथ-साथ गहराई से मैच में बने एक-एक रिकॉर्ड और खास आंकड़ों की जानकारी रहती थी. स्कोरबोर्ड पर नजर कई बार जाती थी. साथ में तस्वीरें तो थी हीं.

ये वो सारी खासियतें हैं जो उस दौर में और उससे पहले कई सालों से इस मैगजीन ने हिंदी में दिलाई थीं, जो आज आसानी से इंटरनेट पर एक क्लिक में मिल जाती हैं. हिंदी में तो एक क्लिक में आज भी इस स्तर का ऑनलाइन क्रिकेट पोर्टल नहीं है.

इस मैगजीन ने इंटरनेशन क्रिकेट के अलावा घरेलू क्रिकेट को भी काफी कवर किया था. हालांकि, सचिन, गांगुली, लक्ष्मण, द्रविड़, सहवाग जैसे हिंदुस्तानी दिग्गजों का नाम गुनगुनाने वाले बच्चे के लिए रणजी की कोई अहमियत नहीं थी, लेकिन रणजी को भी आम पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाने में इस मैगजीन का बड़ा योगदान था.


कई हाथों से गुजरने के बाद मिलता था मौका

मेरे लिए क्रिकेट सम्राट का साथ सिर्फ कुछ महीनों तक चला था. उस दौर में लैंसडाउन जैसे उत्तराखंड के छोटे से कस्बे में पॉकेटमनी जैसी लग्जरी नहीं थी और ये तब भी 25-30 रुपये की थी. पड़ोस के जिन बड़े भैय्या ने मुझे इससे मिलाया था, वो ही हमेशा मेरे लिए इसका सोर्स रहे. हालांकि बीच में घर में जिद करके एक-दो बार मैं भी इसे खरीद पाया था.

उस दौर में इस मैगजीन के अलावा कभी किसी स्पोर्ट्स मैगजीन का नाम तक नहीं सुना था. सिर्फ अखबार के पन्ने और टीवी पर आने वाले मैच ही जानकारी के स्रोत थे. ऐसे में क्रिकेट सम्राट का जलवा अपने आप में था.

एक हाथ से खरीदी मैगजीन कई हाथों से गुजरती थी. फिर चाहे वो एक महीने बाद ही क्यों न पढ़ने को मिले, वो हमेशा खास थी. पहली बार 2002 में भारत-वेस्टइंडीज वनडे और टेस्ट सीरीज के मैच टीवी पर तो देखे थे, लेकिन उन्हें क्रिकेट सम्राट में भी पढ़ा था और तब पहली बार पता चला था, कि कार्ल हूपर वेस्टइंडीज का जाना-माना नाम थे.


2 तस्वीरें, जो हमेशा रहेंगी याद

हालांकि 2003 के बाद इस मैगजीन से वास्ता पूरी तरह खत्म हो गया लेकिन कभी भी उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के अपने किसी क्रिकेट प्रेमी दोस्त से बात होती थी, तो क्रिकेट सम्राट का जिक्र जरूर आता था. अब क्रिकेट सम्राट के बंद होने के साथ ज्यादा जज्बात भले ही न जाहिर हो पाएं, लेकिन दिल में हमेशा इसके लिए प्यार और इज्जत रहेगी.

साथ में याद रहेंगी 2003 वर्ल्ड कप की 2 खास तस्वीरें, जिन्हें इस मैगजीन में खास जगह मिली थी-

एक, केन्या के खिलाफ सुपर सिक्स में गांगुली की अहम शतकीय पारी के दौरान स्पिनर पर आगे बढ़कर जड़ा सिक्सर, जिसे मैगजीन के एक संस्करण में कवर पेज पर लगाया गया था.

दूसरा- वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ दाएं घुटने पर बैठकर सचिन के लगाए कवर ड्राइव की तस्वीर, जिसे संस्करण में बड़े पोस्टर के तौर पर सजाया गया था.

Courtesy: सुमित सुन्द्रियाल